बहुजन दृष्टि सोशल इंजीनियरिंग का पर्याय नहीं है – अनिल चमड़िया

विशद कुमार

  भागलपुर (बिहार) के लहेरी टोला के ए.बी. मल्टीपरपस हॉल में भगत सिंह, सुखदेव व राजगुरु शहादत दिवस के अवसर पर सामाजिक न्याय आंदोलन (बिहार) के बैनर तले ‘बहुजन आंदोलन : दृष्टि, एजेंडा व दिशा’ विषय पर आयोजित विमर्श में बोलते हुए चर्चित बुद्धिजीवी व पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि “बहुजन दृष्टि का मूल तत्व समानता, बराबरी व आजादी है। बहुजन दृष्टि सोशल इंजीनियरिंग का पर्याय नहीं है। सोशल इंजीनियरिंग के जरिए सामाजिक न्याय और बदलाव की राजनीति आगे नहीं बढ़ सकती है।

” उन्होंने आगे कहा कि “सोशल इंजीनीयरिंग के जरिए सामाजिक न्याय की बात करने वाले नेता पारिवारिक सुधार कार्यक्रम चला रहे हैं। हिंदी पट्टी में सामाजिक न्याय की राजनीति के गर्भ से राजपरिवार पैदा हुए हैं। किसी राजनेता के पुत्र का सर्वश्रेष्ठ होने के दावे के साथ उनकी जगह पर स्थापित होने का विशेषाधिकार भी ब्राह्मणवाद ही है।”


इस मौके पर पूर्व राज्यसभा सदस्य व ऑल इंडिया पसमांदा मुस्लिम महाज के अध्यक्ष अली अनवर अंसारी ने कहा कि “सामाजिक न्याय की राजनीतिक धाराओं के पास स्पष्ट व ठोस विचारधारा नहीं है। ‘ए टू जेड’ और ‘सर्वजन’ के नारे के साथ बहुजन दृष्टि का रिश्ता नहीं बनता है। उन्होंने कहा कि “हिंदी पट्टी की सामाजिक न्याय की राजनीति ने पसमांदा की पहचान, आकांक्षा व मुद्दों को स्वीकार नहीं किया है। पसमांदा की राजनीतिक हिस्सेदारी का सवाल भी अनुत्तरित है। उन्होंने कहा कि ‘हिंदू हो या मुसलमान, दलित-पिछड़ा एक समान’ के नारे को सामाजिक न्याय की राजनीतिक धाराओं और बहुजन आंदोलन को स्वीकारना होगा।”

कथाकार व सामाजिक कार्यकर्ता रामजी यादव ने कहा कि “सामाजिक न्याय की बात करने वाली छद्म समाजवादियों ने सामाजिक न्याय के ठोस सवालों पर डटने-टिकने का काम नहीं किया। भूमि सुधार, शिक्षा अधिकार, शासन-सत्ता व कारोबार में दलितों-आदिवासियों व पिछड़ों की हिस्सेदारी की लड़ाई को आगे बढ़ाने से इंकार कर दिया।”
युवा अंबेडकरवादी चिंतक रामायण राम ने कहा कि “वाम आंदोलन में जाति के प्रश्न तो बहुजन आंदोलन में वर्ग के प्रश्न को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा है। जातियों को जोड़ने के बजाय जातियों को खत्म करने की दिशा में बढ़ने की जरूरत है।”

प्रसिद्ध चिकित्सक व सामाजिक कार्यकर्ता डॉ. पीएनपी पाल ने कहा कि “सामाजिक-सांस्कृतिक बदलाव के संघर्ष के बगैर राजनीतिक बदलाव का संघर्ष टिक व बढ़ नहीं सकता है।”
चर्चित बहुजन बुद्धिजीवी डॉ.विलक्षण रविदास ने कहा कि “बहुजन दृष्टि संविधान की प्रस्तावना में अभिव्यक्त हुआ है। बहुजन दलों के पास बहुजन दृष्टि नहीं है। जो राजनीतिक पार्टी और नेता सामाजिक न्याय, आर्थिक न्याय व राजनीतिक न्याय की बात नहीं करता है, वह हमारी पार्टी और हमारा नेता नहीं हो सकता।”
“सामाजिक चिंतक हरिकेश्वर राम ने कहा कि “जाति के खोल में कैद होकर बहुजन चेतना विकसित नहीं हो सकती। जाति उन्मूलन की दिशा में बहुजन चेतना विकसित होगी।”

पत्रकार व सामाजिक कार्यकर्ता शिव दास ने कहा कि “जातीय गोलबंदी के जरिए भाजपा का मुकाबला नहीं हो सकता। वैचारिक धरातल पर सशक्त सांगठनिक ढ़ांचे के बल पर मुकाबला होगा।”
लेखक-चिंतक अयूब राईन ने कहा कि “दलित मुसलमानों को एससी कैटेगरी में शामिल करने को बहुजन आंदोलन का एजेंडा बनाना होगा। हिंदू और मुसलमान दोनों के दलितों-पिछड़ों की एकता बनानी होगी। मुसलमानों में भी 85 प्रतिशत बहुजन हैं।”
बिहार में अतिपिछड़ों के मुद्दों पर सक्रिय नवीन प्रजापति ने कहा कि “बहुजन आंदोलन को शिक्षा-स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि अधिकार को भी एजेंडा बनाना होगा।”
विमर्श की शुरुआत रिंकु यादव ने करते हुए कहा कि “बहुजन आंदोलन से मेहनतकश बहुजनों-मजदूर व किसानों का सवाल गायब है, बहुजन आंदोलन को बहुजनों के मध्यवर्गीय-अभिजात्य बाउंड्री से बाहर निकालना होगा।
प्रथम सत्र का संचालन करते हुए रामानंद पासवान ने कहा कि “जाति को तोड़ने के लिए जाति से बहुजन जमात बनाने की ओर बढ़ने की जरूरत है।”
विमर्श के अंतिम दो सत्र में भी गंभीर चर्चा हुई। बहुजन आंदोलन को क्रांतिकारी धार देने के लिए विमर्श को आगे बढ़ाते हुए जिला व प्रखंड स्तर तक इस तरह के आयोजन की जरूरत को रेखांकित किया गया।बहुजनों के मेहनतकश आबादी के मुद्दों को बहुजन आंदोलन के केन्द्र में लाने के साथ ही हर क्षेत्र में आबादी के अनुपात में प्रतिनिधित्व, जातिवार जनगणना, शिक्षा-स्वास्थ्य, रोजगार, भूमि सुधार, निजीकरण के साथ ही मजदूर-किसानों के अन्य मुद्दों पर अभियान व आंदोलन की जरूरत को रेखांकित किया गया।
अंतिम सत्र में रिंकु यादव ने विमर्श में उभर कर आए मुद्दों पर अभियान चलाते हुए 8 मई को पटना में बढ़ते मनुवादी दबदबे व कॉरपोरेट कब्जा के खिलाफ विशाल ‘बहुजन दावेदारी’ सम्मेलन करने का प्रस्ताव पेश किया। सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित हुआ।
अंतिम दो सत्रों का संचालन करते हुए गौतम कुमार प्रीतम ने कहा कि “बहुजन आंदोलन भारत के नवनिर्माण का आंदोलन है। भगत सिंह और डॉ. अंबेडकर के सपनों का मुल्क बनाने का आंदोलन है। यह संकीर्ण दृष्टि व सीमित एजेंडा के साथ क्रांतिकारी लोकतांत्रिक बदलाव का कार्यभार पूरा नहीं कर सकता है।”
अंतिम सत्र को संबोधित करते हुए वरिष्ठ पत्रकार अनिल चमड़िया ने कहा कि “हुकूमतें बहुजनों की अधिकार की चेतना को नष्ट कर भिखारी चेतना को विकसित कर रही  है। अधिकारों को छीनने के साथ बहुजन समाज को दया दृष्टि का पात्र बनाया जा रहा है।” डॉ.विलक्षण रविदास ने कहा कि “आत्मसम्मान व अधिकार के लिए बहुजनों को व्यापक एकजुटता व दावेदारी को बुलंद करना होगा, सड़कों पर लड़ाई तेज करनी होगी।”
जीरादेई (सीवान) के पूर्व विधायक रमेश कुशवाहा, यूपी के आजमगढ़ से बांके लाल यादव, झारखंड के गोड्डा से रणजीत रावण, पटना यूनिवर्सिटी के छात्र नेता गौतम आनंद, अतिपिछड़ा अधिकार मंच के नवीन कुमार, अरवल से सुबोध यादव, जहानाबाद से राजेश सिंह, हाजीपुर से विजेन्द्र कुमार, आरा से शशि पंडित, अशोक सिंह, गया से सुनील कुमार, सीवान से आजाद कुमार, नालंदा से अवधेश कुमार, खगड़िया से संजीव कुमार, मुंगेर से अमन रंजन यादव,दिलीप पासवान, मणि कुमार अकेला, लक्खीसराय से रामावतार पासवान, बेगूसराय से अवध किशोर राय, कौशल किशोर सिंह, समस्तीपुर से दीपंकर कुमार, मो.ईद मुबारक बरियारपुर (मुंगेर) से विनय कुमार सिंह, मधेपुरा-सहरसा से सुधांशु यादव, विजय कुमार, सासाराम से अरविंद कुमार चक्रवर्ती, बहुजन स्टूडेंट्स यूनियन (बिहार) के सोनम राव, अनुपम आशीष, अभिषेक आनंद, प्रवीण कुमार यादव, निर्भय शर्मा, पांडव शर्मा, अनीश आनंद, अमित, गौरव पासवान, संजीत पासवान, वरूण कुमार, हिमांशु कुमार के साथ प्रो. इकबाल अंसारी सहित कइयों ने अंतिम दो सत्रों में विमर्श में भागीदारी की

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