मजबूत बनने के चक्कर में ‘मजबूर’ हो गये हैं नीतीश! मंजू वर्मा वाली सख्ती से परहेज क्यों?

नीतीश कुमार अपने मंत्रियों के कारनामों की वजह से अक्सर कठघरे में खड़ा किये जाते रहे हैं। बीजेपी के साथ जब वह सरकार चला रहे थे तो मेवालाल चौधरी और मंजू वर्मा की वजह से उनकी किरकिरी हुई थी। उन्होंने आखिरकार दोनों को मंत्रिमंडल से हटा दिया था। तब आरजेडी विपक्ष में था और इसके लिए शोर मचाता रहा था। महागठबंधन के साथ सरकार बनाने के बाद तो नीतीश के मंत्रियों के एक से बढ़ कर एक कारनामे सामने आते रहे हैं। पिछले पांच महीने में मंत्रियों की वजह से कई ऐसी स्थितियां सामने आती रही हैं, जो निश्चित तौर पर नीतीश को भी नागवार लगती रही होंगी।

सुधाकर और कार्तिकेय को हटना पड़ा, चंद्रशेखर बच गये

सुधाकर सिंह और कार्तिकेय सिंह नीतीश के मौजूदा मंत्रिमंडल के सदस्य थे। इन दोनों ने आरोप उजागर होने पर पार्टी की बात मानते हुए इस्तीफा दे दिया था। चंद्रशेखर पर कारतूस बरामदगी का आरोप था, पर वे बचे रह गये। उन्हीं चंद्रशेखर ने रामचरित मानस पर विवादित बयान दिया है। नीतीश उन्हें हटा नहीं पा रहे। दो मंत्रियों की तरह चंद्रशेखर के बारे में नीतीश को उम्मीद है कि आरजेडी ही उनके बारे में फैसला करेगा।

चावल घोटाले का आरोप लगने पर सुधाकर का गया था मंत्री पद

नीतीश कुमार ने 16 अगस्त 2022 को अपने मंत्रिमंडल का विस्तार करते हुए 31 मंत्री बनाए थे। उनमें सुधाकर सिंह और कार्तिकेय समेत 16 मंत्री आरजेडी कोटे से थे। आरजेडी कोटे के मंत्रियों में सुधाकर सिंह, कार्तिकेय सिंह के अलावा चंद्रशेखर और सुरेंद्र यादव भी दागी पाये गये। सुधाकर सिंह कृषि मंत्री बनाये गये थे। सुधाकर सिंह रामगढ़ से विधायक हैं। रामगढ़ विधानसभा क्षेत्र का उनके पिता जगदानंद ने भी 4 बार प्रतिनिधित्व किया था। वे 1995 से 2009 तक इस सीट से लगातार विधायक रहे। सुधाकर सिंह को मंत्री बनाये जाने पर सबको आश्चर्य हुआ था कि जिस नीतीश सरकार ने उनके खिलाफ चावल घोटाले में केस किया, वही नीतीश कुमार उन्हें नयी सरकार में मंत्री बनाने को मजबूर हो गए। चावल घोटाला वर्ष 2013-14 में हुआ था। सुधाकर पर आरोप था कि उन्होंने चावल जमा नहीं कराया और गबन कर लिया। न्यायिक दंडाधिकारी के कोर्ट में यह मामला लंबित है। रामगढ़ थाने में ही उनके खिलाफ केस दर्ज हुआ था। बीजेपी ने जब इस मामले को लेकर हंगामा शुरू किया तो आरजेडी ने सुधाकर को इस्तीफा देने पर मजबूर किया।

दिल्ली हवाई अड्डे पर चंद्रशेखर के पास मिले थे 10 कारतूस

रामचरित मानस पर विवादित बयान देकर हाल में चर्चा का केंद्र बने चंद्रशेखर एक और वजह से मंत्री बनते ही चर्चा में आये थे। हालांकि तब से अब तक वे मंत्री बने हुए हैं। उन्हें तेजस्वी यादव का नजदीकी माना जाता है। शायद यही वजह है कि तब भी उन्हें सुधाकर सिंह और कार्तिकेय की तरह मंत्री पद से नहीं हटाया गया और इस बार भी उनके खिलाफ कार्वाई करने में नीतीश के हाथ-पांव फूल रहे हैं। चंद्रशेखर यादव मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र से तीसरी बार विधानसभा पहुंचे हैं। उन्हें 20 फरवरी 2022 को दिल्ली स्थित इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे (IGIA) से गिरफ्तार किया गया था। वे अपने सामान के साथ 10 कारतूस लेकर जा रहे थे। बाद में उन्हें छोड़ दिया गया था।

अपहरण मामले के आरोपी कार्तिकेय सिंह बने थे कानून मंत्री

आरजेडी कोटे से कार्तिकेय सिंह भी नीतीश के मौजूदा मंत्रिमंडल में कानून मंत्री बनाए गए थे। विपक्ष के हंगामे के बाद उन्हें भी पार्टी के दबाव में मंत्री पद छोड़ना पड़ा था। उन पर 2014 में हुए अपहरण मामले में गिरफ्तारी का वारंट था। अपहरण मामले में मोकामा के पूर्व विधायक अनंत सिंह सहित 16 को आरोपी बनाया गया था, जिनमें कार्तिकेय सिंह का नाम भी था। नीतीश कुमार ने आरोप के मद्देनजर उनका विभाग बदल दिया, लेकिन कार्तिकेय ने इस्तीफा देना ही मुनासिब समझा।

तेजस्वी और तेज प्रताप भी नीतीश की करा चुके हैं फजीहत

उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने अपने राजनीतिक सलाहकार संजय यादव और तेजस्वी के बड़े भाई तेजप्रताप यादव ने अपने बहनोई (मीसा भारती के पति) को विभागीय बैठकों में साथ बैठाया था। इसे लेकर भी नीतीश की किरकिरी हुई थी। इतना ही नहीं, नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू की एक विधायक बीमा भारती ने अपनी पार्टी की मंत्री लेसी सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला था। उन्होंने लेसी पर अपराधियों से सांठगांठ का आरोप लगाया था।

ऐसी शिकायतों पर मंत्री पद से हटाते रहे हैं नीतीश

लोगों को आश्चर्य इस बात पर हो रहा है कि पिछले कार्यकाल में जब मुजफ्फरपुर शेल्टर होम कांड से मंत्री मंजू वर्मा के पति के जुड़ने की जानकारी मिली तो नीतीश ने तब के विपक्षी दल आरजेडी के विरोध पर उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया था। फिर शिक्षा मंत्री मेवालाल चौधरी को भी आरोपों के आधार पर और आरजेडी की आपत्ति पर नीतीश कुमार ने मंत्रिमंडल से निकाल दिया था। और तो और, 2015 में बनी महागठबंधन सरकार से भी नीतीश ने अपनी पार्टी को इसीलिए हटा लिया था कि तेजस्वी यादव अपने आरोपों की सफाई जनता के बीच जाकर दें। लेकिन इस बार नीतीश इतने कमजोर पड़ गये हैं कि ऐसी शिकायतों पर कार्रवाई के बदले वह टालमटोल का रवैया अपना रहे हैं।

बीजेपी के निशाने पर आरजेडी के साथ नीतीश कुमार भी

इस बार आरजेडी की जगह विपक्ष की भूमिका में भाजपा है। पार्टी ने अपने राज्यसभा सदस्य और पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी को फ्रंट फुट पर खुला खेलने की छूट दे दी है। सुशील मोदी इसके पहले लालू परिवार पर हमलावर रह चुके हैं। राज्यसभा जाने के बाद उनके ट्वीट पर विराम लग गया था, लेकिन इन दिनों वे अधिक मुखर हुए हैं। इस बार वे न सिर्फ आरजेडी पर हमलावर हैं, बल्कि उनके निशाने पर परम मित्र माने जाने वाले नीतीश कुमार भी हैं। सुशील मोदी पर यही आरोप लगता रहा है कि वे नीतीश के करीबी हैं। शायद इसीलिए उन्हें भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व ने बिहार की राजनीति से निकाल कर दिल्ली बुला लिया था, ताकि नीतीश से उनकी नजदीकी के असर से पार्टी को बाहर निकाला जा सके।

मजबूत बनने के चक्कर में मजबूर हो गये हैं नीतीश

नीतीश कुमार ने भाजपा छोड़ते वक्त यही कहा था कि वह भाजपा के दबाव से मुक्त होना चाहते थे। पर, उनकी हालत अभी ही ऐसी दिखती है, जैसे ताड़ से गिरे, खजूर पर अटके। एक तो बार-बार साथी बदलने के चक्कर में पहले से ही वह बदनाम हो चुके हैं। दूसरे, एडीआर की रिपोर्ट के मुताबिक उनके मंत्रिमंडल के 80 फीसद मंत्री दागी हैं। हालांकि ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि किसी राज्य सरकार में दागी मंत्री न बने हों, पर नीतीश का अंदाज इस मामले में अलहदा रहा है। वे आरोप लगने पर अपने मंत्रियों को हटाते रहे हैं। हां इस बार की बात अलग है।

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