अचानक नहीं आया ‘अग्निपथ’, कारगिल वाली कमेटी ने की थी ऐसी योजना की सिफारिश: कहा था- सेना को हमेशा जवान और फिट रहना चाहिए

भारतीय सेना ने भी लागत को कम करने के लिए अग्निपथ जैसी एक भर्ती योजना का प्रस्ताव दिया था। सेना ने 2020 में युवाओं को 3 साल के लिए भर्ती करने के लिए टूर ऑफ ड्यूटीयोजना का प्रस्ताव दिया था। मौजूदा योजना में इस प्रस्ताव के साथ कई समानताएँ हैं। हालाँकि, सेना द्वारा प्रस्तुत योजना में सेवा अवधि 4 साल के बजाय 3 साल तय की गई थी।  जब से रक्षा मंत्रालय ने सशस्त्र बलों में भर्ती के लिए अग्निपथ योजना की घोषणा की है, इस योजना को बड़ी संख्या में तथाकथित सैन्य उम्मीदवारों और विपक्षी राजनीतिक दलों के विरोध का सामना करना पड़ा है। हमेशा की तरह राहुल गाँधी ने इस योजना की आलोचना की और इसके खिलाफ विरोध को और भड़काया है।

सशस्त्र बलों में भर्ती की इस नई योजना के तहत चार साल के लिए सैनिकों की भर्ती की जाएगी। यह अवधि समाप्त होने के बाद 25 प्रतिशत अग्निवीरों को सेना में स्थायी कर लिया जाएगा, जबकि बाकी अन्य सशस्त्र बलों, मंत्रालयों, राज्य सरकार एवं पुलिस तथा PSUs में नौकरियों के लिए आवेदन में वरीयता हासिल करेंगे। इन अग्निवीरों को ₹11.71 लाख की राशि एकमुश्त ‘सेवा निधि’ पैकेज के रूप में भुगतान किया जाएगा।

इसे भर्ती प्रक्रिया में आमूल-चूल परिवर्तन कहा गया है। वहीं, सैनिक बनने के इच्छुक कुछ युवा मौजूदा भर्ती प्रक्रिया को जारी रखने की माँग करते हुए इसके खिलाफ ट्रेन जला रहे हैं। दूसरी तरफ विपक्षी दलों एवं सेना के कुछ दिग्गजों ने भी इस योजना की आलोचना की है।

हालाँकि, दो दशक पहले कारगिल समीक्षा समिति की रिपोर्ट में सैनिकों के लिए इतनी छोटी सेवा का सुझाव दिया गया था। कारगिल युद्ध के कारण हुई घटनाओं के क्रम का अध्ययन करने और सिफारिशें करने के लिए गठित समिति ने देश की रक्षा में सुधार के लिए कई सुझाव दिए थे। उनमें से कुछ को पहले ही लागू किया जा चुका है।

समिति की प्रमुख सिफारिशों में से एक सैनिकों की औसत आयु को कम करना था, क्योंकि रिपोर्ट में कहा गया था कि सेना को हर समय युवा और फिट रहना चाहिए। समिति ने सशस्त्र बलों, अर्धसैनिक बलों और केंद्रीय पुलिस बलों के लिए एक एकीकृत जनशक्ति नीति की भी सिफारिश की थी।

कारगिल समीक्षा समिति की सिफारिश

समिति ने कहा था, “देश के सामने आने वाले छद्म युद्ध और बड़े पैमाने पर आतंकवाद की नई स्थिति को ध्यान में रखते हुए अर्ध-सैन्य बलों की भूमिका और कार्यों को पुनर्गठित किया जाना चाहिए, खासकर कमान एवं नियंत्रण तथा नेतृत्व के संदर्भ में। उन्हें प्रदर्शन के उच्च मानकों के लिए प्रशिक्षित करने और आतंकवादी खतरों से निपटने के लिए बेहतर ढंग से सुसज्जित करने की आवश्यकता है। सशस्त्र बलों, अर्ध-सैन्य बलों और केंद्रीय पुलिस बलों के लिए एक एकीकृत जनशक्ति नीति अपनाने की संभावना की जाँच होनी चाहिए।”

रिपोर्ट में आगे कहा गया था, “सेना को हर समय जवान और फिट रहना चाहिए। इसलिए 17 साल की सेवा (जैसा कि 1976 से नीति रही है) की वर्तमान प्रथा के बजाय, यह सलाह दी जाएगी कि सेवा को सात से दस साल की अवधि तक कम कर दिया जाए। इसके बाद अधिकारियों और जवानों को देश के अर्धसैनिक बलों में सेवा के लिए मुक्त कर दिया जाए।”

कारगिल युद्ध के बाद गठित समिति ने सुझाव दिया था कि सेवा अवधि की समाप्ति के बाद उन्हें नियमित पुलिस बलों में लिया जा सकता है या संविधान के अनुच्छेद 5 IA (d) के तहत ‘राष्ट्रीय सेवा कोर (या एक राष्ट्रीय संरक्षण कोर) में शामिल किया जा सकता है, जो भूमि एवं जल संरक्षण और भौतिक एवं सामाजिक बुनियादी ढाँचे के विकास की एक श्रृंखला का नेतृत्व करेंगे।”

समिति ने देखा था कि इससे सेना और अर्ध-सैन्य बलों की औसत आयु कम हो जाएगी और पेंशन लागत भी घट जाएगी। इसके साथ ही अन्य अधिकारों, जैसे विवाहित जवानों के लिए क्वार्टर और शैक्षिक सुविधाओं पर होने वाले खर्च भी घट जाएँगे।

समिति ने महसूस किया था कि 1999-2000 में सेना का ₹6,932 करोड़ का पेंशन बिल कुल वेतन बिल का लगभग दो-तिहाई था और यह हर साल तेजी से बढ़ रहा था। इस वर्ष के बजट में रक्षा के लिए ₹5.25 लाख करोड़ आवंटित किए गए हैं। इनमें से ₹1,19,696 करोड़ अकेले पेंशन के लिए आवंटित किए गए हैं। इसका अर्थ है कि रक्षा बजट का लगभग 25% केवल पेंशन के भुगतान के लिए खर्च किया जाता है। वन रैंक वन पेंशन (OROP) योजना के लागू होने के बाद सेना की पेंशन में तेजी से वृद्धि हुई है।

पेंशन पर खर्च की गई इतनी बड़ी राशि का मतलब है कि सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए बहुत कुछ नहीं बचता है। इससे आधुनिक हथियारों और उपकरण प्रणालियों की खरीद प्रभावित होती हैं। रक्षा क्षेत्र को पहले से ही बजट आवंटन का एक बड़ा हिस्सा मिलता है और इसके हिस्से को बढ़ाने की संभावना बहुत कम है। जहाँ कुछ विशेषज्ञ रक्षा के लिए बजट आवंटन बढ़ाने का सुझाव देते हैं, वहीं कारगिल समिति ने इसके खिलाफ सुझाव दिया था।

यह देखते हुए कि बजटीय बाधाओं ने आधुनिकीकरण की प्रक्रिया को प्रभावित किया है और कुछ परिचालन शून्य पैदा किए हैं, समिति ने कहा था कि रक्षा आवंटन नहीं बढ़ाया जाना चाहिए। इसके बजाय, सरकार को आधुनिकीकरण पर खर्च बढ़ाने का एक और तरीका खोजना चाहिए। रिपोर्ट में कहा गया था, “समिति जीडीपी के किसी भी प्रतिशत को रक्षा क्षेत्र को आवंटित करने की वकालत करना नहीं चाहेगी। इसे संबंधित विभागों और रक्षा सेवाओं के परामर्श से निर्धारित करने के लिए सरकार पर छोड़ दिया जाना चाहिए।”

इन्हीं सिफारिशों को लागू करती है अग्निपथ योजना

इस योजना के तहत 17.5 ​​वर्ष से 21 वर्ष की आयु के बीच के उम्मीदवारों को अग्निवीर के रूप में भर्ती किया जाएगा। वे केवल 4 साल के लिए काम करेंगे, इसलिए एक अग्निवीर की अधिकतम आयु 25 वर्ष होगी। इस प्रकार, सैनिक अपनी पूरी सेवा अवधि में युवा और फिट रहेंगे।

अग्निपथ योजना के तहत भर्ती किए गए 25% अग्निपथ को नियमित कमीशन में शामिल किया जाएगा और उन्हें उच्च रैंक पर पदोन्नत किया जाएगा। बाकी 75% को सरकारी और पीएसयू नौकरियों में वरीयता दी जाएगी। इसमें राज्य पुलिस बलों और केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में भर्ती भी शामिल है। पुलिस बलों में कार्यरत सेना में प्रशिक्षित युवा निश्चित रूप से पुलिस और अर्धसैनिक बलों की संचालन क्षमता में वृद्धि करेंगे।

राज्य और केंद्रीय पुलिस बलों के अलावा सेवानिवृत्त अग्निवीर केंद्रीय और राज्य आपदा बलों की मूल्यवान जनशक्ति होंगे। इसी तरह की नौकरियों में शारीरिक फिटनेस की आवश्यकता होगी। इसलिए, जब 75% युवा 4 साल की सेवा के बाद सेना से निकलेंगे तो उनके लिए सरकारी और निजी क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध रहेगा।

अग्निपथ योजना बढ़ते सेना पेंशन पर रोक लगाने में मदद करेगी, क्योंकि अग्निवीर को उनकी सेवा समाप्त होने के बाद पेंशन का भुगतान नहीं किया जाएगा। हर साल लगभग 45,000 से 50,000 अग्निवीर की भर्ती की जाएगी। इससे सेना को पेंशन भुगतान में बचत होगी।

इन सबकी सिफारिश कारगिल समीक्षा समिति ने दो दशक से भी पहले की थी। हालाँकि, इन दो दशकों में आई सरकारों ने इसे लागू करने की कभी कोशिश नहीं की।

सेना ने तीन साल की भर्ती योजना का रखा था प्रस्ताव

सिर्फ कारगिल समिति ही नहीं, भारतीय सेना ने भी जनशक्ति लागत को बचाने के लिए अग्निपथ योजना के समान एक भर्ती योजना का प्रस्ताव दिया था। सेना ने 2020 में युवाओं को 3 साल के लिए भर्ती करने के लिए टूर ऑफ ड्यूटीयोजना का प्रस्ताव दिया था। मौजूदा योजना में इस प्रस्ताव के साथ कई समानताएँ हैं। हालाँकि, सेना द्वारा प्रस्तुत योजना में सेवा अवधि 4 साल के बजाय 3 साल तय की गई थी।

सेना ने वर्तमान में 17 वर्षों की सेवा अवधि के बजाय तीन वर्षों के लिए सैनिकों को नियुक्त करके पर्याप्त मौद्रिक बचत की गणना की थी। सेना ने कहा था कि इस धन का उपयोग सशस्त्र बलों के आधुनिकीकरण के लिए किया जा सकता है।

सभी सरकारी नौकरियों के ज्वाइनिंग के पहले एक दो साल के लिए सेना की ट्रेनिंग और उनके साथ काम करने की बाध्यता सरकार को करनी चाहिए। कम से कम आफिस में बैठने उठने का तरीका, नागरिकों से बातचीत करने का ढंग और समय इत्यादि का अनुशासन तो सीख जायेंगे। बहुत असर पड़ेगा। ऐसा सोशल मीडिया के ज्ञानी सलाह देते रहते है। यह सुझाव भारत जैसे देश के नौकरशाहों के लिए गलत भी नहीं लगता। 10-15 सालो मे 70% युवा ट्रेंड सैनिक होंगे जिसका फायदा भारत के हर उत्पादन कैपेसिटी मे दिखेगा और 25 साल का युवा जिसके पास आज खुद की जमा पूँजी 1 लाख बमुश्किल मिलती है उसके पास कम से कम 20- 25 लाख होंगे जिससे वो कोई भी अपना काम कर सकता है।

सरकार ज्यादा से ज्यादा युवाओं को सैना की ट्रैनिंग देकर टुकड़े टुकड़े गैंग के संभावित खतरों से देश को बचाने की दूरगामी नीति पर काम कर रही है। भारतीय सेना के लिए अग्निपथ योजना को ऐसे भी समझिए.कि क्यों यह युवाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है . एक तो अभी के समय के अपेक्षा बहुत अधिक युवाओं को इस योजना के तहत सेना में लिया जाएगा, और जो युवा सेना छोड़ेगे वो भी अपने अभिभावक पर बोझ नहीं बनेंगे। उनके पास पर्याप्त संसाधन यानी पैसा होगा। आज गाँव के युवाओं के पास सरकारी स्कूलों से मैट्रिक और इंटर करने के बाद उससे आगे पढ़ने के लिए ना तो पैसा होता है और ना ही कोई स्किल, भविष्य और पूँजी। नतीजा वो नशा एवं अन्य गलत आदतों का शिकार हो जाते हैं। भारत में आने वाली लगभग सारी बड़ी कंपनियों की एक कॉमन शिकायत है कि भारतीय युवा अनुशासित नहीं हैं और इनका एप्रोच प्रोफेशनल नहीं है।

इन दोनों समस्याओं का निदान भी इस योजना से होगा। चार साल तक सेना में काम करने के बाद वो अनुशासन और बेहतर वर्क कल्चर सिख जाएंगे। और चार साल के बाद उनके पास अधिक और बेहतर जॉब औपरचुनिटी होगा। अगर इस योजना का सही कार्यान्वयन हो तो यह हमारे समझ से भारतीय युवाओं के लिए वरदान साबित हो सकता है। वैसे हमारी आदत है कि हम किसी भी बड़े बदलाव का बिना किसी तथ्य और तर्क के विरोध करने लगते हैं।

जैसे भूमि अधिग्रहण कानून, किसान बिल, सीएए आदि… कृपया देश के युवाओं के हित में सेना के लिए लाए गए अग्निपथ योजना में वही गलती न दोहराएं। सेना में कौन जाता है…? ज्यादातर गाँव गिरावं के किसानो के लड़के। ये वो लड़के होते हैं… जिनके पास उच्च शिक्षा के लिए पैसे नहीं होते और न ही… कोई कारोबार के लिए फंड होता है। ले दे के इनकी किस्मत या तो सेना पुलिस या फिर महानगरों की झोपड़पट्टी में रह के दस पाँच हजार की नौकरी में बीत जाती है। अग्निवीर योजना इन्ही युवाओं को ध्यान में रख के बनाई गई है।

इसमें नकारात्मकता मत ढूँढ़िए। ये युवक आईएएस बनने नहीं जा रहे… और जिनकी सामर्थ्य और साधन डॉक्टर इंजीनियर बनने की है उन्हे सेना में जाने की जरूरत क्या है…? अब आइए इसके पॉजिटिव पहलू पे बात करते हैं। चार साल में कुल मिला के इन अग्निवीरों को लगभग 24 लाख मिलने जा रहे हैं। ये पूरा आपका बचत है… खर्चा कोई नहीं… रहना खाना… आना जाना सरकार का। अब आप इससे दो काम कर सकते हैं…! पहला ये की पूर्वी यूपी और बिहारी मानसिकता के तहत इन 24 लाख रुपयों से आग म्यूत सकते हैं…! मतलब ये दिखावा… वो दिखावा… शोशेबाजी…!

दूसरा काम टिपिकल गुजराती माइंडसेट से कर सकते हैं। महेश चंद्र कौशिक की किताब SIP के चमत्कार पढ़ डालिए। और पहले महीने से ही बताये हुए विधि से NiftyBees या फिर किसी अच्छे म्युचुअल फंड में निवेश शुरू कर दें। जब आप चार साल बाद सेना से बाहर होंगे तो आपके पास लगभग 30 लाख रुपये होंगे…! अब आप इन पैसों के इन्वेस्ट पे सालाना 20% के हिसाब से CAGR (Compound annual growth rate) बना सकते हैं। अब सेना से बाहर आके कोई और जॉब कर सकते हैं… और अपना निवेश कंटीन्यू करते रहिये। लगभग दस साल बाद बिना कुछ किये घर बैठे आपको 50 हजार हर महीने मिलते रहेंगे। तीसरा आप ये भी कर सकते हैं के चार साल बाद जब आप बाहर आयें तो रोज ही धरना प्रदर्शन करें। और यकीन मानें आप यही तीसरा वाला ही करेंगे।

#अग्नीवीर #अग्निपथ सम्बंधी कुछ महत्वपूर्ण बिंदु:

1. विश्व मे कम से कम 100 देशों मे सेना मे काम करना अनिवार्य माना जाता है। कम से कम दो साल की नौकरी करना अनिवार्य है। इजराइल जैसे देश मे यदि आप सिनेमा मे काम करते हैं, यदि आप डाक्टर हैं, कम्प्युटर वैज्ञानिक हैं या फिर आप कविता लिखते हैं, आपको सेना मे काम करना ही है। केवल अपाहिज लोगों को इसमे छुट मिलती है। भारत मे अग्निवीर पद्धति के अनुसार सेना मे चार साल नौकरी का विकल्प है। आपको यह नौकरी करने के लिए कोई बाध्य नही कर सकता। ना ही सेना के इस नौकरी से देश की अन्य नौकरी पर कोई असर पड़ने वाला है।

2. अग्निवीर एक ऐसा जरिया है जिसके तहद मात्र चार साल की नौकरी सुनिश्चित की जाती है। उसके बाद 25% अग्नीवीरों को स्थाई रुप से सेना मे नौकरी मिल जाती है और शेष 75% कोई अन्य नौकरी कर सकते हैं।

3. यदि मानकर चलें कि वर्तमान मे सेना मे प्रतिवर्ष 50,000 की भर्ती होती है। यह भर्ती होती रहेगी। अर्थात कुछ समय बाद 1.5 लाख लोग (75%) प्रत्येक साल सेना मे चार साल नौकरी करने के बाद ओपेन जाब मारकेट मे आ जाएँगे और 50 हजार (25%) सामान्य रुप मे सेना मे स्थाई रुप से जम जाएँगे।

4. ये डेढ़ लाख लोग पूर्ण रुप से प्रशिक्षित रहेंगे। ध्यान दीजिए कि सेना मे प्रशिक्षण केवल हथियार चलाने के लिए नही होता है। हथियार चलाना तो कुल प्रशिक्षण का 10% भी नही है। अन्य 90% प्रशिक्षण शारीरिक और मानसिक प्रशिक्षण होता है जिससे विपरीत परिस्थितियों मे जीना सिखाया जाता है। शारिरीक और मानसिक रुप से प्रशिक्षित 1.5 लाख लोग अन्य जाब, जैसे फ्लिपकार्ट, मेडिकल रिप्रेजेंटेटिव, सेल्समैन, लाजिस्टिक/ट्रांस्पोर्टेशन इत्यादि जैसे लाखों जाब के लिए उपलब्ध रहेंगे।

5. प्राइवेट कम्पनियाँ जो आज इस बात के लिए भारत की निंदा करती है कि यहाँ के लोगों मे स्किल उपलब्ध नही है। उनको पके पकाए 1.5 लाख लोग प्रतिवर्ष मिलेंगे जो ईमानदारी और अनुशासन की शिक्षा लेकर आए हैं। इससे प्राइवेट इंडस्ट्री को बूस्ट मिलेगा।

6. यदि कोई 17 साल मे आर्मी ज्वाइन करता है तो 21 मे वह रिटायर होगा। 24 मे ग्रैजुएट होगा और उस समय उसके पास शुद्ध ट्रेनिंग और 12 लाख रुपैये मौजूद रहेंगे।

7. आज से बीस साल बाद 22 लाख आर्मी से प्रशिक्षित युवाओं (जिनकी उम्र 35 से कम होगी) की फौज होगी जिनको कभी भी युद्ध अथवा शांति के समय मे प्रयोग मे लाया जा सकता है।

8. वर्तमान में देश मे सिर्फ 1% परिवार सरकारी नौकरी के बदौलत चलती है। 99% लोग अपना रोजगार खुद करते हैं। प्रश्न ये है कि कानून किसके पक्ष मे बनना चाहिए, जिससे 99% लोगों का भला हो या फिर 1% लोगो का।

9. इस अग्नीवीर पद्धति से सरकार के उपर मे खर्चा कम होगा। जनता के टैक्स के पैसे 1% के उपर मे खर्चा नही होकर 99% अन्य लोगों के भलाई के काम पर खर्चा होगा।

10. सरकार जनता के टैक्स का पैसा किसी निकम्मे व्यक्ति (सरकारी नौकरी करने वाले) के जीवन यापन सुनिश्चित करने के लिए क्यों खर्च करेगी। अन्य सरकारी विभाग मे भी यही नियम लागू हो आपकी नौकरी मात्र तीन-चार साल के लिए सुरक्षित है। यदि आपके अंदर मे स्किल है तो आपको अगला काम मिलेगा वरना आप ओपेन मार्केट मे है।जिराफ़ अपने बच्चे को बैठ कर नहीं खड़े होकर जन्म देती है। उसका बच्चा दुनिया मे आते ही 8 फीट नीचे से गिरता है। वो दर्द से करहाता है। तभी माँ उसको एक ज़ोर से लात मारती है। दूसरी लात न पड़े बच्चा वहा से खिसकने की कोशिश करता है, तभी माँ एक लात और मार देती है, वो खड़ा होने का प्रयास करता है तभी एक लात और मार देती है वो गिर कर फिर खड़ा होता है फिर एक लात और ये  क्रम तब तक चलता है जब तक वो दर्द को भूल कर चलने नहीं लगता।

ये हमे एक माँ की कूरता लग सकती है पर ये क्रूरता नहीं है। वो बच्चे को शेर का शिकार बनने से बचाने के लिए ये करती है, ताकि वो जल्दी से जल्दी चलना और भागना सीख जाये, इसी के कारण जिराफ का बच्चा एक घंटे मे चलने लगता है। ये क्रूरता नहीं है माँ उसको जीवन का पाठ सीखा रही होती है की जीवन संघर्षो से भरा होता है। जीवन मे संघर्ष नहीं तो सफलता नहीं, परिश्रम और संघर्ष दोनों अलग बात होती है, भारत के लोग परिश्रमी ज्यादा है संघर्षशील नहीं है इसलिए बेरोजगरी का रोना सरकार को कोसना, भगवान को कोसना, सिस्टम को नेताओ को कोसना बड़ा आम है। भारत के बच्चे भर भर के नंबर लाते है ये नंबर परिश्रम से आते है, पर पीसा स्कोर मे भारत के बच्चे 73 देशो मे 72वी स्थान पर आते है। मोदी योगी ममता की तुलना अगर राहुल और अखिलेश से करे तो इनमे फर्क संघर्ष का है।

एक जमीन पर संघर्ष करते हुए ऊपर आए एक माँ बाप के कारण मुफ्त मे मिली विरासत से नेता बने। संघर्ष के कारण मोदी योगी जैसे सफल है और राहुल अखिलेश जैसे सर्व सुविधा युक्त होते हुए भी असफ़ल है। आरक्षण जिंदगी से संघर्ष कम कर देता है, 70+ साल से मिल रहा है। कई इसके कारण आईआईटी आईआईएम एम्स मे पहुचे, पर आप से पाँच लोगो के नाम भी पूछ लू जिन्होंने किसी क्षेत्र मे कोई बड़ी उपलब्धि प्राप्त की हो तो आप पाँच नाम भी नहीं बता पाएंगे। आरक्षण न मिलने वालो ने तीन गुना ज्यादा तरक्की कर ली क्योकि उनके जीवन मे संघर्ष बढ़ गया। अगर आप आरक्षण के आने के पहले का इतिहास पढ़ेंगे तो 70% उच्च स्थानो पर वो होते थे जिन्हें आज संवैधानिक पिछड़ा बना दिया गया है।

आरक्षण उनके लिए जहर है जिन्हें मिल रहा है और उनके लिए वरदान है जिन्हें नहीं मिल रहा है इसलिए वो हर जगह आगे है। आप अमेरिका की शिक्षा व्यवस्था देखे, इज़राइल की देखे, जापान की देखे, स्वीडन की देखे, इनमे संघर्ष भरा हुआ है। और हमारा देखे तो आराम से भरा हुआ है, कुछ के पासींग मार्क भी कम है, कुछ को जीरो मे भी नौकरी मिलती है, प्रोजेक्ट कोई दूसरा बनाता है या इंटरनेट से डाउन लोड होते है। 80% प्रश्न पुराने पेपरो से होते है, कुछ अंट शंट भी लिख के आ जाओ तो भी पास हो जाते है। यहा इंजीनियरिंग तक मे लोग 90%+ ले आते है जो दुनिया मे और कही नहीं होता। संघर्ष नहीं तो सफलता नहीं। 14 साल के संघर्ष ने ही राम को प्रभु श्री राम बनाया वरना सिर्फ एक अयोध्या जैसे छोटे से राज्य के साधारण राजा होते। जो मा बाप बच्चो के जीवन से संघर्ष कम करने मे लगे रहते है वो उनके सबसे बड़े दुश्मन होते है।

अग्निपथ योजना के अंतर्गत सेना के तीनों अंगों- थल सेना, वायुसेना और नौसेना में भर्ती प्रक्रिया होगी। पहले के सारे नोटिफिकेशन अब मान्य नहीं होंगे। अगर तीनों सेनाओं के किसी भी भर्ती में कोई अभ्यर्थी फिजिकल या मेडिकल टेस्ट पास कर चुका है तो भी वह मान्य नहीं होगा।

युवाओं में राष्ट्रवाद, अनुशासन और संयम सिखाने के लिए इस्रायल (Israel) की तर्ज पर केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार (Narendra Modi Government) द्वारा शुरू की गई महात्वकांक्षी परियोजना ‘अग्निपथ’ का की जगहों पर विरोध हो रहा है। इस विरोध प्रदर्शन में अपना हित साधने वाले राजनीतिक दलों का भी बड़ा हाथ है।

सेना में युवाओं की भर्ती को लेकर केंद्र की अग्निपथ योजना का विरोध बिहार से शुरू होकर 7 राज्यों में फैल चुकी है। इनमें यूपी, उत्तराखंड, हरियाणा, मध्य प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान आदि राज्यों में छात्रों ने जबरदस्त विरोध किया है।

बिहार में प्रदर्शनकारियों ने 5 ट्रेनों को आग के हवाले कर दिया है। वहीं, संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया गया है। हरियाणा के पलवल में प्रदर्शनकारियों ने DC पर पथराव किया और पुलिस की 5 गाड़ियों को आग के हवाले कर दिया। नेशनल हाइवे को कब्जे से मुक्त कराने के लिए पुलिस को आँसू गैस के गोल छोड़ने पड़े और हवाई फायरिंग करनी पड़ी।

वहीं, हरियाणा के रोहतक में एक पीजी हॉस्टल में रहने वाले एक युवक ने इस योजना के विरोध में आत्महत्या कर ली। सचिन नाम का यह युवक जींद जिले के लिजवाना गाँव का रहने वाला था। बताया जा रहा है कि वह सेना भर्ती की नई पॉलिसी से परेशान था। वहीं, राज्यों में भी युवा तोड़फोड़ और आगजनी की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं।

यह विरोध तक शुरू हुआ है, जब कुछ राजनीतिक दलों ने इस इस योजना पर सवाल उठाते हुए कहा कि सेना में पेंशन को खत्म करने के लिए ही सरकार यह पॉलिसी लेकर आई है। इतना ही नहीं नेताओं ने इस योजना के तहत युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करने का भी आरोप लगाया।

क्या है अग्निपथ की अग्निवीर योजना

अग्निपथ योजना भारतीय सेना के लिए एक देशव्यापी शॉर्ट-टर्म यूथ रिक्रूटमेंट स्कीम है। इस स्कीम के तहत भर्ती होने वाले युवाओं को अग्निवीर कहा जाएगा। इन्हें सेना के मानकों के तहत भर्ती किया जाएगा और उन्हें 4 वर्षों तक सेना में सेवा देनी होगी। इसके बाद इनमें से 25 प्रतिशत युवाओं को सेना में नियमित कर लिया जाएगा, जबकि बाकी के 75 प्रतिशत वापस लौट जाएँगे।

इस दौरान सरकार ने युवाओं को प्रशिक्षण और उन्हें तय मानदेय देने का भी निर्णय लिया है। इसके साथ ही चार वर्ष की अवधि पूरा होने के उपरांत उन्हें एकमुश्त देय राशि का भी प्रावधान किया गया है।

इन सबके बावजूद युवाओं के मन में कई तरह के सवाल हैं। ऐसे ही कुच महत्वपूर्ण सवालों और सरकार द्वारा दिए गए उनके जवाबों को हम रख रहे हैं।

  1. चार साल सेना में बिताकर लौटे युवाओं का भविष्य क्या होगा? उनकी शिक्षा पर क्या असर होगा?

अग्निपथ योजना के तहत सेना में शामिल होने वाले अग्निवीरों में से 25 प्रतिशत को नियमित किया जाएगा। बाकी 75 प्रतिशत युवकों को सरकार CRPF और असम राइफल्स में प्राथमिकता के आधार पर बहाल करेगी। इसके अलावा, यूपी और उत्तराखंड जैसी सरकारों ने भी इन्हें राज्य पुलिस में प्राथमिकता देने की बात कही है। वहीं, कई मंत्रालय, सरकारी कंपनियाँ ने भी अग्निवीरों को नौकरी देने में सहमति जताई है।

इसके अलावा, इन चार सालों बाद उनके युवाओं के पास 11.7 लाख रुपए की एकमुश्त राशि रहेगी। इससे वे इसका उपयोग पेशेवर पढ़ाई या किसी तरह के व्यवसाय के लिए इस्तेमाल कर सकते हैं।

इस चार वर्षों के दौरान अग्निवीरों की शिक्षा के लिए केंद्र सरकार ने विशेष डिग्री की अनुमति दी है। इस डिग्री कोर्स का संचालन इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (IGNOU) द्वारा किया जाएगा। अग्निवीरों को पहले साल ग्रेजुएशन सर्टिफिकेट, दूसरे साल ग्रेजुएशन डिप्लोमा और तीसरे साल ग्रेजुएशन डिग्री मिल जाएगी।

इसका 50 प्रतिशत हिस्सा कौशल विकास, जो अग्निवीरों के अनुभव से जुड़ा होगा और बाकी का 50 प्रतिशत हिस्सा विषय से जुड़ा होगा। यह कोर्स UGC-AICTE सहित सभी नियामकों तथा देश-दुनिया में भी मान्य होगा।

2. क्या अग्निवीरों को हर ट्रेड के लिए अलग-अलग उम्र सीमा होगी और भर्ती की प्रक्रिया क्या होगी?

आर्मी के अनुसार, सेना में सारी भर्तियाँ अब अग्निपथ योजना के तहत ही होंगी और इन भर्तियों की आयु सीमा 17.5 साल से 21 साल तक की सीमा के बीच होंगी। इसके लिए 90 दिन में भर्ती रैली होगी और योग्यता पूरा करने वाले उम्मीदवार इसमें भाग ले सकते हैं।

अग्निपथ योजना के अंतर्गत सेना के तीनों अंगों- थल सेना, वायुसेना और नौसेना में भर्ती प्रक्रिया होगी। पहले के सारे नोटिफिकेशन अब मान्य नहीं होंगे। अगर तीनों सेनाओं के किसी भी भर्ती में कोई अभ्यर्थी फिजिकल या मेडिकल टेस्ट पास कर चुका है तो भी वह मान्य नहीं होगा।

3. एक वक्त ऐसा भी आएगा, जब सेना में अग्निवीर अधिक और स्थायी सैनिक कम हो जाएँगे?

इंडियन आर्मी के वाइस चीफ ने कहा कि सेना में अधिकतम 50 प्रतिशत ही अग्नवीर होंगे। यानी अग्निवीर और स्थायी सैनिकों का अनुपात 50:50 का होगा, इससे ज्यादा का नहीं। सेना का कहना है कि आगे अगर कोई दिक्कत आती है तो वह आवश्यक बदलाव के लिए तैयार है।

4.पिछले 2 साल से सेना में कोई भर्ती नहीं हुई है, तो क्या सेना में जाने के इच्छुक लोगों को उम्र में छूट का प्रावधान है?

अग्निपथ योजना के शुरू करने के बाद इसमें उम्र को लेकर किसी भी तरह की छूट का प्रावधान नहीं किया गया है। सरकार का मानना है कि कोविड को लेकर पिछले सालों के दौरान भर्तियाँ नहीं हुई हैं, इसके बावजूद उम्र में छूट नहीं दी गई है।

5.अग्निवीरों को सेना की तरह पेंशन और एक्स सर्विसमैन को मिलने वाली दूसरी सुविधाएँ मिलेंगी?

अग्निपथ योजना में इसका प्रावधान नहीं किया गया है। चार साल की सेवा के बाद ना तो पेंशन मिलेगी और ना ही पूर्व सैनिक वाली दूसरी सुविधाएँ। इस सेवा काल के दौरान अग्निवीरों को 30 हजार रुपए से लेकर 40 हजार रुपए तक की सैलरी मिलेगी। सेवा निधि स्कीम के तहत जो पैसे जमा होंगे वह उन्हें मिलेंगे।

6.अस्थायी नौकरी को लेकर सेना के प्रति युवा कितने उत्सुक होंगे?

इस विषय पर एयरफोर्स चीफ का कहना है कि युवाओं को एक साथ तीन मौके दिए जा रहे हैं। उन्हें अच्छा वेतन दिया जाएगा, चार साल में ठीक-ठाक बैक बैलेंस दिया जाएगा और स्किल ट्रेनिंग दी जाएगी। सेना में ट्रेनिंग के क्रेडिट पॉइंट भी मिलेंगे। यह चार साल बाद हायर एजुकेशन लेने में सहायता करेगा।

इसके अलावा, राज्य सरकार की पुलिस और मंत्रालयों एवं PSUs में में वरीयता मिलने के कारण यह नौकरी अस्थायी जैसी नहीं रहेगी। यह एक तरह से सेना का प्रशिक्षण जैसा हो जाएगा। जो 25 प्रतिशत शानदार काम करेंगे, उन्हें नियमित किया जाएगा।

7. अग्निपथ के तहत भर्ती कब शुरू होगी और कितने लोगों की होगी?

सेना की भर्तीय रैली 90 दिन में होगी। करीब 180 दिन बाद पहले चरण के अग्निवीर सेंटर में पहुँच जाएँगे। एक साल में अग्निवीर भारतीय सेना की बटालियन का हिस्सा हो जाएँगे। पहले साल आर्मी में 40 हजार, नेवी में 3 हजार और एयरफोर्स में करीब 3,500 अग्निवीरों की भर्ती होगी।

8. अग्निपथ योजना के तहत अग्निवीर ऑल इंडिया ऑल क्लासबेस पर आएँगे। ऐसे में पुराना रेजीमेंटेशन सिस्टम खत्म होगा?

नहीं ऐसा नहीं होगा। इंडियन आर्मी के वाइस चीफ लेफ्टिनेंट जनरल बीएस राजू के अनुसार, रेजीमेंटेशन का मतलब सिर्फ एक समुदाय से आने वाले लोग नहीं है। इसका मतलब है कि साथ रहना, खाना, बैठना, ट्रेनिंग करना और साथ लड़ना।

अग्निवीर साढ़े तीन साल साथ रहेंगे और 25 प्रतिशत जो नियमित होंगे वह बटालियन में ही रहेंगे। राजू के अनुसार, सेना में अभी भी 75 प्रतिशत यूनिट में ऑल इंडिया ऑल क्लास ही हैं। फाइटिंग फॉर्मेंशन में कुछ फिक्स्ड क्लास हैं। जैसे राष्ट्रीय राइफल में अलग-अलग रेजिमेंट से आकर लोग लड़ते हैं।

9. अग्निवीरों के स्थायी होने का कितना चांस है?

अग्निवीरों में से सिर्फ 25 प्रतिशत ही स्थायी होंगे। बाकी के 75 प्रतिशत लोग वापस सिविल के तौर पर लौट जाएँगे। हालाँकि, कई भर्तियों में उन्हें वरीयता दी जाएगी।

10.अग्निपथ योजना का उद्देश्य क्या है?

सैन्य बजट का एक बड़ा हिस्सा सेवानिवृत सैनिकों के पेंशन में खर्च हो जाता है। सेना को आधुनिक बनाने के लिए पेंशन खर्च को कम करने पर कई बार चर्चा हुई है। हालाँकि, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह के अनुसार, अग्निपथ योजना का उद्देश्य बचत करना नहीं है। इसके पीछे युवाओं में अनुशासन, देशभक्ति और आंतरिक गुणों का विकास भी बताया जा रहा है।

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