भारत को संपूर्ण स्वाधीन बनाते हुए, स्वतंत्रता कि ओर आगे बढ़ाना है…

“भारत को संपूर्ण स्वाधीन बनाना है” शीर्षक के मेरे अगले आलेख में मैंने भारत की “स्वतंत्रता” के बारे मे उल्लेख किया था की…

  • हिरेन वी॰ गजेरा

“हम ‘स्वाधीनता’ को ‘स्वतंत्रता’(आजादी) समझ कर एक ओर गलती कर रहे है। अब स्वतंत्र तो हम है ही नहीं।“ अब आप सोच रहे होंगे की, स्वतंत्र भारत को स्वतंत्र न कहेना और एसी पागलपन जैसी बाते करने वाले को किसी पागलखाने में भर्ती कर देना चाहिए। तो इसमें गलती आपकी बिलकुल नहीं है। गलती तो आजतक हमे पढ़ाई व रटाई गई तथाकथित कहानियों से हमारे मस्तिष्क में घर कर गई उस धारणा कि है, जिसके आगे सोचने कि हमने कभी कोशिश ही नहीं कि। तो चलिए भारत को संपूर्ण स्वाधीन बनाते हुए स्वतंत्रता कि ओर आगे बढ़ाने के लिए हम पहले “स्वाधीनता” और “स्वतंत्रता” को समझने कि कोशिश करते है…

आज भी हम क्यों स्वतंत्र नहीं है…? हम स्वतंत्रता को कैसे प्राप्त कर सकते है…? स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए हमे कैसे प्रयासों की आवश्यकता है…? इन सब प्रश्नो के उत्तर के लिए हमें पहले हमारे “स्व” को जानना, उसे महेसूस करना बहुत ही जरूरी है। ‘स्वाधीनता’ और ‘स्वतंत्रता’ इन दोनों ही शब्दों में आनेवाला ‘स्व’ अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब हम कहते हैं की, अपने लोगों के ‘अधीन’ तो इसका अर्थ है, देश के ‘स्व’ को जाननेवाले-माननेवाले लोग और उन के अधीन देश याने देश पर एसे लोगों का शासन। स्वाभाविक रूपसे हमलोगों ने ‘स्वाधिनता’ और ‘स्वतंत्रता’ इन दोनों ही शब्दो को समान अर्थवाला मान लिया। परंतु जब थोड़ा बारीकी से विचार करे तो ध्यान में आता है की उनके अर्थ थोड़े से भिन्न है।

‘स्व’ और ‘अधीन’ को मिलाकर ‘स्वाधीन’ बना है, जिसका अर्थ है ‘अपने लोगो के अधीन’। १९४७ से पहले भारत में अंग्रेज़ो का शासन था। अंग्रेज़ भारत के लिए पराये थे और हम उसके अधीन थे। याने हम ‘पराधीन’ थे। उन्हे भगाकर उनके स्थानपर अपने लोगों का शासन लाना याने ‘स्वाधीन’ होना। किसी भी देश के संदर्भ में ‘स्व’ याने उस देश की पहचान होती है। ‘स्व’ और ‘तंत्र’ को मिलाकर ‘स्वतंत्र’ बना है, जिसका अर्थ है ‘अपना तंत्र’ याने ‘अपने विचारों पर आधारित तंत्र’। जब हम कहते है कि ‘अपना तंत्र’ तो इसका अर्थ है की देश जिन तंत्रो के आधार पर चलता है वह शिक्षा, अर्थ, शासन, न्याय, व्यापार, उधोग, कृषि के आधार पर विकास और उन्नति करता है वे सभी हमारे तत्वज्ञान, विचारप्रणाली, जीवंनद्रष्टि, विश्वद्रष्टि, निसर्गद्रष्टि इत्यादि पर आधारित होने चाहिए। वैसे स्वतंत्र को जब अंग्रेजी भाषा में Independent शब्द के अर्थ से लिया जाता है तब ‘स्वाधीन” और “स्वतंत्र” को समानार्थी माना जा सकता है।

आज हम जिसे आजादी कहते है उस तथाकथित आज़ादी का कानून अंग्रेजों के संसद में बनाया गया और इसका नाम रखा गया Indian Independence Act यानि भारत के स्वतंत्रता का कानून। अब Commonwealth Nations में हमारी एंट्री जो है वो एक Dominion State के रूप में है Independent Nation के रूप में नहीं है। इसका एक मतलब तो यहीं निकलता है की, १५ अगस्त १९४७ को हमारी आज़ादी की बात कही जाती है वो झूठ है।

१४ अगस्त १९४७ की रात को जवाहरलाल नेहरु, जिन्ना समते कांग्रेस कमिटी और लोर्ड माउन्ट बेटन के बीच में जो कुछ हुआ है वो आजादी नहीं बल्कि ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर(Transfer of Power Agreement) का एग्रीमेंट हुआ है। यानि भारतीय सत्ता के हस्तांतरण कि संधि ये इतनी खतरनाक संधि है की अगर आप अंग्रेजों द्वारा सन १६१५ से लेकर १८५७ तक किये गए सभी ५६५ संधियों या कहें साजिशों को जोड़ देंगे तो उस से भी ज्यादा खतरनाक संधि है ये।  हमे यह स्वीकारना होगा की, स्वतंत्रता और सत्ता का हस्तांतरण ये दो अलग चीजे है। और सत्ता का हस्तांतरण कैसे होता है, ये तो देश में हर पाँच साल में आने वाले लोकसभा चुनावों के पश्चात आप देखते ही होंगे। एक शासनकर्ता पक्ष चुनाव में हार जाये तब विजय होने वाले दूसरे शासनकर्ता पक्ष का शासन आता है, तब दूसरे पक्ष के प्रधानमंत्री जब शपथ ग्रहण करते है, तो वो शपथ ग्रहण करने के तुरंत बाद एक रजिस्टर पर हस्ताक्षर करते है, तो जिस रजिस्टर पर आने वाले प्रधानमंत्री हस्ताक्षर करते है, उसी रजिस्टर को ट्रान्सफर ऑफ़ पॉवर की बुक कहते है और उस पर हस्ताक्षर के बाद पुराने प्रधानमंत्री नए प्रधानमंत्री को सत्ता सौंप देते है। १४ अगस्त १९४७ की रात को १२:०० बजे यही नाटक हुआ था। इस संधि के अनुसार ही भारत के दो टुकड़े किये गए जिसे भारत और पाकिस्तान नामक दो “डोमिनियन स्टेट्स” (एक बड़े राज्य के अधीन एक छोटा राज्य) बनाये गए हैं। मतलब सीधा है की हम (भारत और पूर्व/पश्चिम पाकिस्तान) आज भी अंग्रेजों के अधीन ही हैं।

भारत और हमारे लिए ये दुर्भाग्य कि बात है की उस समय के सत्ता के लालची लोगों ने बिना सोचे समझे या आप कह सकते हैं की पुरे होशो हवास में इस संधि को मान लिया या कहें जानबूझ कर ये सब स्वीकार कर लिया। इस में रखी गई शर्तो कि बात करे तो, शायद आप जनते होंगे, ८ सितंबर के दिन जिसका निधन हुआ वह ब्रिटेन कि महारानी हमारे भारत की भी महारानी थी और वह विश्व के ७१ देशों की महारानी थी, जिसमे भारत का नाम भी शामिल है। इन ७१ देशों में जाने के लिए इन्हे कोई वीजा नहीं लेना पड़ता था। जब कि भारत या अन्य ७० देशों के राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री को ब्रिटन जाने के लिए वीजा लेना आवश्यक है। ब्रिटेन कि महारानी जब भी भारत आती है तो उनको २१ तोपों की सलामी दी जाती है, जबकि हमारे देश में प्रोटोकोल है, जब भी देश में नए राष्ट्रपति बनेंगे तब उनको ही २१ तोपों की सलामी दी जाएगी उसके अलावा किसी को भी नहीं। पीछली बार ब्रिटेन कि महारानी यहाँ आयी थी तो एक निमंत्रण पत्र छपा था और उस निमंत्रण पत्र में ऊपर जो नाम था वो ब्रिटेन कि महारानी का था और उसके नीचे भारत के राष्ट्रपति का नाम था मतलब हमारे देश के राष्ट्रपति देश के प्रथम नागरिक नहीं है। ये है राजनितिक गुलामी, हम कैसे माने की हम एक स्वतंत्र देश में रह रहे हैं ? भारत का नाम इंडिया रहेगा और सारी दुनिया में भारत का नाम इंडिया प्रचारित किया जायेगा और सारे सरकारी दस्तावेजों में इसे इंडिया के ही नाम से संबोधित किया जायेगा। हमारे और आपके लिए ये भारत है लेकिन दस्तावेजों में ये इंडिया है। संविधान के प्रस्तावना में ये लिखा गया है “India that is Bharat” जब क़ि होना ये चाहिए था “Bharat that was India” लेकिन दुर्भाग्य इस देश का की ये भारत के जगह इंडिया हो गया। ये भी इसी संधि के शर्तों में से एक है। अपितु हम हमारा इतिहास देखे तो हमें ज्ञात होगा, भारत जब तक भारत था तब तक तो दुनिया में सबसे आगे था और ये जब से इंडिया हुआ है तब से पीछे, पीछे और पीछे ही होता जा रहा है।

तथाकथित इस आजाद देश की संसद में १९९७ तक यानी ५० वर्षो तक वन्दे मातरम् गीत नहीं गाया गया। क्योंकि ये भी इसी संधि की शर्तों में से एक है। १९९७ में पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिंह जी ने इस मुद्दे को संसद में उठाया तब जाकर पहली बार इस तथाकथित आजाद देश की संसद में वन्दे मातरम् गाया गया और वन्दे मातरम् को ले के मुसलमानों में जो भ्रम फैलाया गया वो अंग्रेजों के दिशानिर्देश पर ही हुआ था। इस गीत में कुछ भी ऐसा आपत्तिजनक नहीं है जो मुसलमानों के मजहबी भावनाओं को ठेस पहुचाये। आपत्तिजनक तो जन, गन, मन में है जिसमे एक शख्स को भारत भाग्यविधाता यानि भारत के हर व्यक्ति का भगवान या कहें भगवान से भी बढ़कर बताया गया है। इस संधि की शर्तों के अनुसार सुभाष चन्द्र बोस को जिन्दा या मुर्दा अंग्रेजों के हवाले करना था। यही वजह रही क़ि सुभाष चन्द्र बोस अपने ही देश के लिए लापता रहे और कहाँ खप गए ये आज तक किसी को मालूम नहीं है। समय समय पर कई अफवाहें फैली लेकिन सुभाष चन्द्र बोस का पता नहीं लगा और न ही किसी ने उनको ढूँढने में रूचि दिखाई। मतलब भारत का एक महान स्वतंत्रता सेनानी अपने ही देश के लिए बेगाना हो गया। इस संधि की शर्तों के अनुसार भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, अशफाकुल्लाह, रामप्रसाद विस्मिल जैसे हमारे क्रांतिवीर आतंकवादी थे और यही हमारे पाठ्यक्रम में काफी वर्षो तक पढाया जाता था। और अभी कुछेक साल पहले तक ICSE बोर्ड के किताबों में भगत सिंह को आतंकवादी ही बताया जा रहा था, वो तो भला हो कुछ लोगों का जिन्होंने अदालत में एक केस किया और बाद मे अदालत ने इसे हटाने का आदेश दिया।

इस संधि की शर्तों के अनुसार अंग्रेज देश छोड़ के चले जायेगे लेकिन इस देश में कोई भी कानून चाहे वो किसी क्षेत्र में हो नहीं बदला जायेगा। इसलिए आज भी इस देश में भारतीय पुलिस अधिनियम, भारतीय सिविल सेवा अधिनियम जिसका अब शेष नाम (भारतीय नागरिक प्रशासनिक अधिनियम) है, भारतीय दंड संहिता, भारतीय नागरिकता अधिनियम, भारतीय अधिवक्ता अधिनियम, भारतीय शिक्षा अधिनियम, भूमि अधिग्रहण अधिनियम, आपराधिक प्रक्रिया अधिनियम जैसे ३४७३५ कानून वैसे के वैसे चल रहे हैं जैसे अंग्रेजों के समय चलते थे। मौजूदा समय में इनमेसे कुछेक कानूनों मे थोडसा बदलाव हुआ है बाकी सब के सब आज भी वैसे ही चल रहे हैं बिना फुल स्टॉप और कौमा बदले हुए। कानून व्यवस्था का उद्देश्य होता है देश में अपराध कि मात्रा कम करने के लिए कठोर दंड देनेवाले नियमों को कड़ाई से लागु करना। यह समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।

तथाकथित आजादी कि इस संधि के अनुसार अंग्रेजों द्वारा बनाये गए भवन जैसे के तैसे रखे जायेंगे। शहर का नाम, सड़क का नाम सब के सब वैसे ही रखे जायेंगे। आज देश का सुप्रीम कोर्ट, हाई कोर्ट, राष्ट्रपति भवन सब के सब वैसे ही खड़े हैं। आप भी अपने शहर में देखिएगा वहां भी कोई न कोई भवन, सड़क उन लोगों के नाम से होंगे। गुजरात प्रांत के हमारे सूर्यपुर(सुरत शहर) में कूपर विला नाम की एक बंगला है। अंग्रेजों को जब जहाँगीर ने व्यापार का लाइसेंस दिया था तो सबसे पहले वो सूर्यपुर(सुरत) में आये थे और सूर्यपुर में उन्होंने इस बंगले का निर्माण किया था। ये गुलामी का पहला अध्याय आज तक हमारे सूर्यपुर(सुरत शहर) में खड़ा है। हालांकि आज मौजूदा समय में भारतीय नौसेना के ध्वज में शामिल भारतीय नौसेना के पिता छत्रपति शिवाजी महाराज की मुद्रा का आकार, राजपथ(किग्स-वे) का नाम कर्तव्य पथ करना और इसी कर्तव्य पथ से गुजरते ८ सितंबर यानि कल सेंट्रल विस्टा एवन्यू में इंडिया गेट पर ज्योर्ज पंचम का पुतला हटा कर हमारे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री नेताजी सुभाष चन्द्र बॉस जी कि मूर्ति को स्थापित करना एसे ही डेलहाउस मार्ग को दारा शिकोह मार्ग, औरंगजेब मार्ग को एपिजे अब्दुल्ल कलाम मार्ग नाम देने के साथ-साथ आज देश के कई प्रांतो में मार्ग, शहर, जिले के नाम बदलने का निर्णय सराहनीय और स्वागत योग्य निर्णय है। कोलोनियल मानसिक गुलामी से मुक्तता एवं हमारे “स्व” की ताकत, हमारे “स्व” के अभिमान का हम इसे एक अच्छा उदाहरण कह सकते है। अपितु सिर्फ इतने से हमने खुश नहीं होना है, हमें गुलामी कि अनुभूति कराते एसी कई निशानियों अभी मिटाना बाकी है।

इस संधि की शर्तों के हिसाब से हमारे देश में आयुर्वेद को कोई सहयोग नहीं दिया जायेगा मतलब हमारे देश की विद्या हमारे ही देश में ख़त्म हो जाये ये साजिश की गयी। आयुर्वेद को अंग्रेजों ने नष्ट करने का भरसक प्रयास किया था लेकिन ऐसा कर नहीं पाए। दुनिया में जितनी भी पैथी हैं उनमे ये होता है की पहले आप बीमार हों तो आपका इलाज होगा लेकिन आयुर्वेद एक ऐसी विद्या है जिसमे कहा जाता है की आप बीमार ही मत पड़िए। आपकी जानकारी के लिए कहूँ तो १७८० में एक अंग्रेज भारत आया था और यहाँ से प्लास्टिक सर्जरी सीख के गया था। कहने का मतलब ये है की उस समय हमारे देश का चिकित्सा विज्ञान कितना विकसित था। ये सब आयुर्वेद की वजह से था और उसी आयुर्वेद को आज हमारे शासनकर्ताओं ने हाशिये पर पंहुचा दिया है। हालाकी मौजूदा समय में देश के शासनकर्ता हमारे आयुर्वेद को विश्वस्तर पर बढ़ावा देने हेतु भरपूर कार्यशील है।

इस संधि के हिसाब से हमारे देश में गुरुकुल संस्कृति को कोई प्रोत्साहन नहीं दिया जायेगा। हमारे देश की समृद्धि और यहाँ मौजूद उच्च तकनीक की वजह ये गुरुकुल ही थे। और अंग्रेजों ने सबसे पहले इस देश की गुरुकुल परंपरा को ही तोडा था। गुरुकुल का मतलब हम लोग केवल वेद, पुराण, उपनिषद ही समझते हैं जो कि यह हमारी मुर्खता है अगर आज की भाषा में कहूं तो ये गुरुकुल जो होते थे वो सब के सब उच्च शिक्षा संस्थान हुआ करते थे।

लार्ड मेकॉले कि एक उक्ति जो उसने २ फ़रवरी १८३५ को ब्रिटिश संसद में बताई थी, अगर इसे हमारी भाषा में कहूँ तो उसने कहा था, “मैंने भारत के कौने-कौने का भ्रमण किया है और मैंने यहाँ एक भी व्यक्ति ऐसा नहीं देखा जो भिखारी हो, चोर हो, ऐसे उच्च कोटि के लोग और इन लोगों के ऐसे उच्च नैतिक मूल्यो के साथ-साथ ऐसा धन मैंने इस देश में देखा है की मुझे नहीं लगता हम इस देश को कभी भी जीत पाएंगे, जब तक कि हम इस देश कि रीढ़ कि हड्डी को नहीं तोड़ देते, जो कि इनकी आध्यात्मिक और सांस्कृतिक विरासत है। इसलिए, मेरा प्रस्ताव है की हम उसकी पुरानी शिक्षा प्रणाली, उसकी संस्कृति और प्राचीनता को बदल दें क्योंकि यदि भारतीयों को लगता है कि जो कुछ भी विदेशी है अपने से अधिक है, अपने से बढ़िया है और अंग्रेजी अच्छी है, तो वे अपना आत्म सम्मान, अपनी मूल संस्कृति खो देंगे और वे वही बन जाएंगे जो हम उन्हें चाहते हैं, वास्तव में हमारे प्रभुत्व वाला राष्ट्र।“

चलिए गोरे अंग्रेजों ने जो किया सो किया ये तो यही करने भारत आये थे। लेकिन उनके जाने के बाद सत्ता का हस्तांतरण होने के पश्चात देश के तंत्र पर शासन जमाने वाले यहाँ के काले अंग्रेजो ने क्या किया…? ये भी इतने वर्षो तक इनको बढ़ावा देते रहे। हालांकि २०१८ केबिनेट में मंजूर हुई हमारी नई शिक्षा नीति जो २०२३ से देश में लागू होने वाली इस नई शिक्षा नीति को जहाँतक मैने पढ़ा है, अगर यह नीति देश में सही तरीके लागू होती है तो आने वाले समय में हमें पुरानी शिक्षा कि गुलामी से काफी हदतक मुक्ति मिलने कि उम्मीद है। अब आगे देखते इस नई शिक्षा नीति को भारत में कैसे लागू किया जाता है और कैसे अपनाया जाता है।

इस संधि में एक और खास बात है। इसमें कहा गया है कि अगर इंडिया की अदालत में कोई ऐसा मुक़दमा आ जाये जिसके फैसले के लिए इस देश में कोई कानून न हो या उसके फैसले को लेकर संविधान में भी कोई जानकारी न हो तो साफ़-साफ़ संधि में लिखा गया है की वो सारे मुकदमों का फैसला अंग्रेजों के न्याय पद्धति के आदर्शों के आधार पर ही होगा, भारतीय न्याय पद्धति का आदर्श उसमे लागू नहीं होगा। कितनी शर्मनाक स्थिति है ये की हमें अभी भी अंग्रेजों का ही अनुसरण करना होगा। अंग्रेजी का स्थान अंग्रेजों के जाने के बाद भारत में वैसे ही रहेगा जैसा क़ि अभी १९४६ में है और ये भी इसी संधि का हिस्सा है। आप देखिये की हमारे देश में, संसद में, न्यायपालिका में, कार्यालयों में, बेंकों में, होस्पिटलों एवं आरोग्य जांच कि रिपोर्टों में हर कहीं अंग्रेजी-अंग्रेजी और अंग्रेजी ही है जब क़ि इस देश में महत्तम लोगों को अंग्रेजी नहीं आती है। और उन लोगों क़ि हालत देखिये क़ि उन्हें मालूम ही नहीं रहता है क़ि उनको पढना क्या है ?

हमारे देश में १५ अगस्त १९४७ के ५० साल बाद तक संसद में वार्षिक बजट शाम को ५:०० बजे पेश किया जाता था। जानते है क्यों ? क्योंकि जब हमारे देश में शाम के ५:०० बजते हैं तो लंदन में सुबह के ११:३० बजते हैं और अंग्रेज अपनी सुविधा से उनको सुन सके और उस बजट की समीक्षा कर सके। ये भी इसी संधि का हिस्सा है। १९३९ में द्वितीय विश्व युद्ध शुरू हुआ तो अंग्रेजों ने भारत में राशन कार्ड का सिस्टम शुरू किया क्योंकि द्वितीय विश्वयुद्ध में अंग्रेजों को अनाज क़ि जरूरत थी और वे ये अनाज भारत से चाहते थे। इसीलिए उन्होंने यहाँ जनवितरण प्रणाली और राशन कार्ड क़ि शुरुआत क़ि। इस राशन कार्ड को पहचान पत्र के रूप में इस्तेमाल उसी समय शुरू किया गया और वो प्रणाली आज भी इस देश में लागू है क्योंकि वो इस संधि में है। जिनके पास राशन कार्ड होता था उन्हें ही वोट देने का अधिकार होता था। आज भी देखिये इस देश में राशन कार्ड ही मुख्य पहचान पत्र है।

अंग्रेजों के आने के पहले इस देश में गायों को काटने का कोई कत्लखाना नहीं था। मुगलों के समय तो ये कानून था की कोई अगर गाय को काट दे तो उसका हाथ काट दिया जाता था। अंग्रेज यहाँ आये तो उन्होंने पहली बार कलकत्ता में गाय काटने का कत्लखाना शुरू किया। पहला शराबखाना शुरू किया और इस देश में जहाँ जहाँ अंग्रेजों की छावनी हुआ करती थी वहां वहां शराबखाना खुला, वहां वहां गाय के काटने के लिए कत्लखाना खुला। उन अंग्रेजों के ऐसे पुरे देश में ३५५ छावनियां थी। अंग्रेजों के जाने के बाद ये सब ख़त्म हो जाना चाहिए था लेकिन नहीं हुआ क्योंक़ि ये भी इसी संधि में है। हमारे देश में जो संसदीय लोकतंत्र है वो दरअसल अंग्रेजों का वेस्टमिन्स्टर सिस्टम है। ये अंग्रेजो के इंग्लैंड क़ि संसदीय प्रणाली है। ये कहीं से भी न संसदीय है और न ही लोकतांत्रिक है। लेकिन इस देश में वही सिस्टम है क्योंकि वो इस संधि में कहा गया है। और इसी वेस्टमिन्स्टर सिस्टम को गाँधी जी बाँझ और वेश्या कहते थे। अब इसका मतलब आप समझ गए होंगे। आप RTI करके जानकारी प्राप्त कर सकते है की, आज भी भारत के गवर्नर कि निमणुक ब्रिटन से करी होती है।

ऐसी हजारों शर्तें हैं, मैंने अभी जितना जरूरी समझा उतना लिखा है। मतलब यही है की, इस देश में जो कुछ भी अभी चल रहा है वो सब अंग्रेजों का है हमारा कुछ नहीं है। इस देश को मुगलों ने तलवार के दम पर गुलाम बनाया था। मुगलों ने तलवार के दम पर हमारी संस्कृति नष्ट की, हमारे पौराणिक ग्रंथो का नाश किया, हमारी शिक्षा नष्ट की, हमारे धर्म स्थलों को लूटा उसे ध्वस्थ किया, हमारी धन-संपाती को लूट कर हम पर आधिपत्य जमाया, हमारे पुरुषों को काटा-मारा और हमारा धर्म परिवर्तन करवाया। हमारे साथ जो-जो काम मुगलों ने तलवार की नौक पर किया। वह सारे काम अंग्रेजों ने हमारे साथ विभिन्न कानून बनाकर किये है। 

भारत को संपूर्ण स्वाधीन बनाते हुए, स्वतंत्रता कि ओर आगे बढ़ाना है…

भाग-२

अंग्रेजों के खिलाफ अंग्रेजों को इस भूमि से भगाने के लिए भारत में १८५७ में मंगल पांडे जी ने पहली क्रांतिकारी मुहिम शरू कि। वह क्रांति इतनी तेजी से समग्र भारत में फ़ेल गई की, मेरठ से शरू हुई यह क्रांति देखते ही देखते कच्छ और लाहौर तक पहोच गई। इस क्रांति को देखकर अंग्रेज़ डर गए और उन्हे लगा की इसे किसी भी तरीके से रोकना बहुत जरूरी है, इसे रोकने के लिए क्या किया जाए ? तब मैकाले को पूछा की अब क्या किया जाए ? मैकाले जो भारत का अध्ययन करने १० साल पहले ही यहा आ गया था जो पढ़ालिखा लॉ का शिक्षक था, कानूनी ज्ञान के साथ एक शिक्षा शास्त्री भी था। जो यहाँ हमारे गुरुकूल बंद करावा कर कन्वर्ट इंट स्कूले चला रहा था। सारी घटनाओं का विश्लेषण करने के बाद काफि विचारविमर्श के साथ उसने दिए सुझाव के मुताबिक अंग्रेजों ने एक लॉ कमीशन बनाया जो आज भी चल रहा है। मैकाले को इस कमीशन का अध्यक्ष बनाकर कानून बनाने की ज़िम्मेदारी दी गई। मैकाले ने तीन साल महेनत करके १९६० में पहला कानून बनाया भारतीय दण्ड संहिता(IPC)। १८५७ की मंगल पांडे जी कि क्रांति के बाद यहाँ के लोगों को बर्बाद करने उसे अपराधी घोषित करने के लिए भारत में जो पहला कानून बना वह इंडियन पीनल कॉड(IPC) है। भारत देश की अपनी मातृभूमि के लिए लड़ने वाले क्रांतिकारियों को बंदी बनाने और देश में अंग्रेजों के खिलाफ कोई आवाज न उठाए इस हेतु से इस कानून को एसे डिज़ाइन किया गया है की, आप जिसको चाहो जैल में भेज दो, जिसको चाहे बेल दे दो। जिसे चाहे छह महीने में रिहा करदों, जिसे चाहे सालों-सालों तक जैल में रखो। क्यूकी हरजगह राज उनका ही था। इसलिए कानून भी अपना, पुलिस भी अपनी, थाना भी अपना, वकील भी अपना, जज भी अपना जिसको चाहे ठुसदों। दुर्भाग्य से यह कानून आज भी चलता है। आज भी हमारे देश में जब सुप्रीम कोर्ट का कोई जज अपना कार्यकाल पूरा करके निवृत होता है तब उनकी जगह नए जज कि निमणुक वह खुद करके जाते है। मतलब निवृत होने वाले जज साहब अपने वारिस को या उनके नाती को जज कि कुर्सी पर बैठकर जाते है।

दूसरा कानून सन् १९६१ में पुलिस एक्ट बनाया। जिस में उन्होनें घर के चार भाइयों में से एक को पुलिस में भर्ती करवाकर दुसरे भाइयों को पिटवाना शरू किया। यह सब करने के बाद उन्होने सोचा हिंदुस्थान का सबसे पावरफूल सेंटर क्या है ? उस पर मैकाले ने कहा यहाँ का सबसे पावरफूल पॉलिसी निर्माण सेंटर है वो मंदिर है, क्योकि यहाँ सारी जितनी बैठके होती है, जितनी भी नीतिया, जीतने भी नियम, जीतने भी प्रस्ताव पास होते है वह सारे यहाँ के मठ-मंदिर से पारित हो कर बनाए जाते है, तो उन्होने १८६३ तीसरा कानून बनाया ‘Religious endowments act’ और ये कानून बनाकर उन्होने हिंदुस्थान के ४,००,०००(चार लाख) मठ-मंदिरों को अपने कंट्रोल में ले लिया। आज भी भारत के ४ लाख मठ-मंदिर सरकार के कंट्रोल में है। एक भी चर्च, एक भी दरगाह, एक भी मझार, एक भी मस्जिद सरकार के कंट्रोल में नहीं है। लेकिन हमारे ४ लाख मठ-मंदिर सरकार के कंट्रोल में है। क्यूकी ये कानून आज भी चलता है। और हम बिना शर्मिंदगी महेसूस किए अपने आपको आजाद देश का नागरिक कहते है।

आज के समय में हमारे मठ-मंदिरों से सरकारें १,००,०००(एक लाख करोड़) करोड़ रुपे हर साल वसूल करती है। किसी दरगाह, मझार, मस्जिद, चर्च से एक रुपया भी नहीं लिया जाता। बल्कि हमारे इसी पैसोको शासनकर्ता मदरसे, मस्जिदों के इमामो एवं मौलानाओं की त्ंखा और उनके मेंटेनेस के लिए उपयोग करते है। अभी हाल ही में एक RTI में खुलासा हुआ की, दिल्ली प्रांत की स्थानीय सरकार ने वर्ष २०१५-१६ में ३ करोड़ १८ लाख रुपए इमामो–मौलवियों को दिए, यही रकम बढ़ाकर वर्ष २०१९-२० में ९ करोड़ ३४ लाख हो गई। अबतक दिल्ली की सरकार वहाँ के इमामो-मौलवियों को २८ करोड़ ६६ लाख रुपये लूटा चुकी है। ये तो सिर्फ एक ही प्रांत की बात हुई बाकी रहे प्रांतो का हिसाब लगा लीजिए हमारे मठ-मंदिरों को कंगाल, बर्बाद करने के लिए बनाए इस कानून का कैसे फ़ाईदा लिया जा रहा है। जैसा की आगे बताया की मुगलों ने तलवार की ज़ोर पर हमारे मंदिर-मठ लूटे वही काम अंग्रेजों ने कानून बनाकर किया और आज भी भारत के शासनकर्ता इसी कानून से वहीं काम कर रहे है। भारतीयों को मानसिक, वैचारिक, आधिकारिक तरीके से गुलाम बनाए रखने के लिए एसे कई कानूनों का निर्माण किया गया है। १९४७ में अंग्रेज़ तो चले गए लेकिन हमें गुलाम बनाए रखने के लिए एसे कई कानून छोड़ गए है। जिसे बदलने कि या रद्द करने कि आजतक न तो हमने मांग कि और न ही देश के तंत्र को चलाने वाले शासनकर्ताओं को इसे बदले कि या रद्द करने कि जरुरत महेसूस हुई।

अंग्रेजों ने भारत की प्रशासन व्यवस्था को उनके लिए अनुकूल हो एसा बनाया। अतः उन्होंने प्रशासन प्रशिक्षण के माध्यम से उनमें और जनता में दूरी रहे और अंग्रेज शासकों के लिए पूरी तरह प्रतिबद्ध हों एसे सुनिश्चित किया। कम-अधिक मात्र में यही स्थिति आज भी बनी हुई है। समाज और शासन के बिच की कड़ी है प्रशासन। इसलिए प्रशासन का समाज से सहज और शासन से नित्य सवांद होना चाहिए। जैसे छत्रपति शिवाजी महाराज ने अपने राज में शत्रुओं से सतत संघर्ष करते हुए भी स्थानीय मराठी भाषा में प्रशासकीय शब्दकोष अत्यंत आग्रहपूर्वक बनाया था एसे ही आजका प्रशासन अधिकारिक लोकाभिमुख हो इसलिए सभी प्रशासकीय आदेश स्थानीय भाषा में होने चाहिए। इसके लिए आजकी शासन-प्रशासन व्यवस्था, अर्थतंत्र, न्यायतंत्र इत्यादि सब आचार्य कौटिल्य के ग्रंथो में लिखित है एसे करने होंगे।

स्वतंत्रता याने वे समस्त तंत्र जिनके आधारपर देश आगे बढ़ता है, भारत के ‘स्व’ पर आधारित होने चाहिए और यह हो सके इसलिए देश कि जनता के साथ-साथ विशेष रूप से शासकों और प्रशासकों ने भारत के ‘स्व’ को जानना और मानना चाहिए तथा उनपर श्रद्धा रखनी चाहिए। इस बात को ध्यान में रखते हुए की तंत्र परिवर्तन एक धीमी प्रक्रिया है, इसलिए उतावलापन न कराते हुए धैर्य से काम करते हुए हमें अपने देश के समस्त तंत्र को भारतीय विचारों पर आधारित बनाना है। इसलिए देश की स्वतंत्रता हेतु तंत्र परिवर्तन को अपना दायित्व सझकर समूचे देश के सर्व समाज के उन सभी नागरिक जो किसिभी विषय में सामर्थ्यता, योग्यता एवं क्षमता प्राप्ति करी है उन नागरिकों को आगे आना होगा। परिवर्तित तंत्र को सही ढंग से क्रियान्वयन करने के लिए देश के सभी नागरिकों के मन-मस्तिष्क की पुनर्संस्कृतिक सोच होना आवश्यक है। क्यूकी भारत की एक बहुत बड़ी विशेषता यह है की भारतीय समाज का जीवन शासक निर्भर न होते हुए स्वतः पर निर्भर है। शायद इसीलिए कहा गया है की…

आततायी के आक्रमण और शासन के कारण यूनान (ग्रीस), मिस्र (इजिप्त), रॉम (इटली) इत्यादि देश दुनिया से समाप्त हो गए याने उनकी मूल संस्कृति समाप्त हो गई। लेकिन भारत में कुछ एसी बात है की सैंकड़ों वर्षो के आततायी आक्रमण और शासन के बाद भी हमारी पहचान याने संस्कृति मिट नहीं पाई।

भारत में शासन, प्रशासन, सुरक्षा(आंतरिक बाह्य), कानून-व्यवस्था, न्याय, विदेश नीति इत्यादि तंत्र ही शासन निरभर हैं। शेष सभी तंत्र समाज निरभर है, जिनके आधार पर देश कि भौतिक और आध्यात्मिक उन्नति होती है। इन में शासन की भूमिका नियामक, प्रोत्साहक, संरक्षक और कठिन समय में सहायक वाली होती है।

अगर हम यह मानते है की, भारतीय समाज का जीवन शासक निर्भर न होते हुए स्वतः पर निर्भर है और हमारा देश लोकतांत्रिक है तथा यह देश संविधान से चलता है। तो एक देश एक संविधान, एक देश एक कानून, सर्वधर्म समभाव और बिनसांप्रदायिकता का नगाड़ा पीटने वाले भारत में वक्फ कानून और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ जैसे एकतरफ़ी मजहबी कानूनों कि मान्यता आज हमें यह स्वीकारने को मजबूर करता है की, इस देश में आज भी हम मुगल एवं अंग्रेज शासन के गुलाम बने हुए है… भारत विभाजन के बाद मजहब के नाम पर एक-तिहाई भूमि लेने के बाद भी भारत के कौने-कौने में ढेरों पाकिस्तान बनाने के उनके मंसूबो को साकार करने के लिए वक्फ जैसे कानून ईसे प्रोत्साहित कर रहे है। आज भारत मे सबसे अधिक जमीन में तीसरे स्थान पर वक्फ है। संविधान का मतलब होता है सम विधान, सबके लिए एक ही विधान। लेकिन यहाँ तो संविधान की परिभाषा धर्म और मजहब के आधार पर तई की गई है। देखा जाए तो हम आज भी इस विधान के गुलाम है। कहा है समान शिक्षा ?, कहा है समान नागरिक संहिता ?, कहा है समान न्याय संहिता…? संविधान में दर्ज कलम ३० एवं ३०ए को आप अपनी गुलामी नहीं कहेंगे क्या…? आज हम अपने ही देश में किसी भी पाठशाला, विद्यालय, महाविद्यालय में अपने धर्म ग्रंथो की शिक्षा नहीं ले सकते। ये कानून बाकी सब मजहब/संप्रदायों को छोड़ कर सिर्फ हम पर ही लागू किए जाने के पीछे क्या कारण है…? १९४७ में जिस कारणवश भारत का विभाजन हुआ उस कारण को नजरंदाज करके भारत के तंत्र के काले अंग्रेज़ संचालको का एक तरफा तुष्टीकरण करके देश के संविधान में उनको अलग शिक्षा, अलग कानून, अलग न्याय प्रणाली, अलग मजहबी छुट-छाट को परोसना, कहीं न कहीं हमें गुलामी का एहसास करा रहे है। देश को ध्यान में रखते हुए तैयार की गई अल्पसंख्यक–बहुसंख्यक की उस एक ही परिभाषा को देश के सभी प्रांतो के ऊपर उस परिभाषा को थोप देने के कारण आज इस देश के ९ प्रांत के साथ-साथ २१४ से भी ज्यादा जिल्ले के अल्पसंख्यकों के अस्तित्व पर प्रश्नार्थ खड़ा हो गया है। हमारे संविधान में विशेष प्रावधान प्रदान करने वाले उन सभी अधिकार जो हमें बारा-बारा गुलामी का एहसास कराते है उन सभी प्रावधानों को संविधान से हटाना होंगा।

२६ जनवरी १९५० को हमने अपना संविधान स्वीकार किया। अंतः प्रतिवर्ष हम १५ अगस्त को स्वाधीनता दिवस और २६ जनवरी को गणतंत्र दिवस मानते है। अपितु हमने अभी शासन तंत्र सहित अपने सारे तंत्रों को पूरी तरह ‘स्व’ आधारित तंत्र नहीं बनाया है, यानि १९५० के बाद देश के शासनकर्ता संविधान मे अबतक १०० से अधिक संशोधन कर चुके है। एक बात याद रखे कोई भी शासक बिना मांग के कुछ नहीं करेगा। जबतक हम हमारी मांगे देश के सामने नहीं रखेंगे तब तक कुछ परिवर्तन नहीं होगा। इसलिए हमे हमारी मांग खड़ी करनी ही होंगी। इसके लिए तंत्र परिवर्तन के हमारे लक्ष्य प्राप्ति हेतु हमें एक समय मर्यादा निर्धारित करनी होगी। क्यीकी जैसा हम चाहते हैं वैसा तंत्र परिवर्तन करने में समय लगता है। इसलिए स्वाधीनता कि ७५वीं वर्षगांठ मनाते हुए हमने लिए उन पंच प्रण में से दूसरे प्रण की सार्थक के लिए अमृतकाल के अगले २५ साल को हमें हमारे लक्ष्य प्राप्ति कि समय मर्यादा बनानी होगी। क्योकि एकबार हम समय मर्यादा निर्धारित करेंगे तो तंत्र परिवर्तन के लक्ष्य कि प्रक्रिया गति पकड़ सकेगी। आज काफी कानूनों एवं संसदीय नीतियों में हमने तंत्र परिवर्तन कि सफलता प्राप्ति कि है तब हमने केवल यहाँ तक ही न रुकते हुए भारत कि इस आधी अधूरी ‘स्वाधिनता’ को प्राप्त करने के बाद संपूर्ण स्वाधीनता को हासिल करके पूर्ण स्वतंत्रता के लिए हमने अपने राष्ट्र के प्रति अपना कर्तव्य समझकर भारत कि संपूर्ण स्वतंत्रता प्राप्ति के लिए आगे बढ़ते एसे कदमों के साथ हमें हमारे कदम मिलाने होगे और निर्भयता के साथ, बिना ठके, विराट आत्मबल के साथ गुलामी के एक भी अंश को नहीं रखने का संकल्प लेते हुए हमने ऐसी अनगिनत गुलामी से भारत को आजादी दिलानी है और संपूर्ण स्वाधीनता को स्वतंत्रता में परिवर्तित करते हुए पूर्ण ‘स्वतंत्रता’ की प्राप्ति करनी है…!!!

 

  • हिरेन वी॰ गजेरा

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