भारत के संविधानिक मूल्यों पर तीन दिवसीय प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न

रांची

  झारखंड की राजधानी रांची कांके (बोड़ेया) स्थित बदलाव संस्थान में राज्य के विभिन्न जिलों से आये सामाजिक अगुओं का भारत के संविधानिक मूल्यों पर तीन दिनी प्रशिक्षण कार्यशाला संपन्न हुई। 28 से 30 जून तक चले इस कार्यशाला में बतौर मुख्य प्रशिक्षक सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व राज्य सलाहकार सदस्य बलराम जी ने कहा कि समानता, स्वतंत्रता, न्याय और बंधुता इन्ही चार मूल्यों की बुनियाद पर हमारा संविधान बना है, और ये मूल्य दुनिया के किसी भी देश और मानव समाज के केन्द्रीय मूल्य हैं।

उन्होंने आगे कहा संविधानिक मूल्य आम तौर पर दिखाई नहीं पड़ते, लेकिन उनसे उपजे हक़ अधिकार और जिम्मेवारियाँ दिखाई पड़ती हैं. संविधानिक मूल्यों से ही मौलिक अधिकार, सरकारी आदेश और कानून बनाये जाते हैं।  आदिवासी मामलों के जानकार सुनील मिंज ने कहा कि संविधान निर्माताओं ने संविधान में ही पांचवी और छठी अनुसूची का प्रावधान कर दिए हैं, जिसे संविधान के अन्दर आदिवासी क्षेत्रों में मिनी संविधान का दर्जा प्राप्त है, जिसमें उन इलाकों के आदिवासियों को ब्यापक अधिकार मिले हैं।

ग्राम सभाओं को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका तीनों अधिकार प्राप्त हैं। अब ग्राम सभाओं को तीसरी सरकार का दर्जा प्राप्त है। साथ ही इस अनुसूची के तहत राज्य के राज्यपालों और आदिवासी सलाहकार परिषद् को भी भारतीय संविधान ने असीमित अधिकार प्रदान किये हैं। इसी परिपेक्ष्य में 1996 में पेसा कानून भी भारतीय संसद द्वारा पारित किया गया। लेकिन अत्यंत ही दुर्भाग्य है कि राज्य सरकार ने ढाई दशक बाद भी पेसा नियमावली बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

सामाजिक कार्यकर्ता जेम्स हेरेंज ने कहा, भारतीय संविधान में प्रदत्त अधिकारों और नीति निर्देशक तत्वों को ध्यान में रखते हुए सरकारें नागरिक अधिकारों को सुनिश्चित करने के लिए कानून और नीतियाँ निर्धारित करती हैं। हाल के दशकों में भारतीय संसद द्वारा पारित अधिकार आधारित कानून यथा सूचनाधिकार कानून, महात्मा गाँधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, वनाधिकार कानून, शिक्षा का अधिकार कानून और राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून आदि। लेकिन नागर समाज का मानना है कि संविधान में प्रदत्त अधिकारों और कर्तब्यों के अनुपात में ये कानून महज उस दिशा में उठाये गए चंद सांकेतिक पहल हैं। इसमें संविधानिक मूल्यों को प्राप्त करने की दिशा में ब्यापक कदम उठाया जाना अभी शेष है। 

फिलिप कुजूर जो झारखण्ड और देश के खनन क्षेत्रों में लोगों के प्राकृतिक संसाधनों और पर्यावरण मुद्दों पर सक्रियता से कार्य करते हैं, कहा कि सरकारें आज भी खनन और दूसरी बड़ी परियोजनाओं के लिए जो भूमि अधिग्रहण करती हैं, वह अंग्रेजों द्वारा बनाया गया कानून 1894 के तहत् करती है, जिसमें सिर्फ मुआवजा की बात कही गई है। जबकि 2013 में अधिनियमित कानून में मुआवजा के साथ ही पुनर्वास औ पर्यावरणीय संरक्षण की गारंटी की गई है।

1894 का भूमि अधिग्रण कानून सरकारों के लिए वर्तमान कानूनों की अपेक्षा कई गुना फायदेमंद है। लेकिन आदिवासियों को अथाह नुकसान पहुँचाने वाला अन्याय और कपटपूर्ण कानून है। एनसीडीएचआर के राज्य संयोजक मिथिलेश कुमार ने प्रभागियों को वनाधिकार कानून 2006 की जानकारी देते हुए कहा कि यह कानून देश का प्रगतिशील कानून जरुर है। लेकिन सरकारों इसे ईमानदारी पूर्वक लागू नहीं कर रही हैं। राज्य स्तर पर निगरानी समिति जिसके अध्यक्ष स्वयं मुख्यमन्त्री हैं, पुनर्गठन नहीं किया गया है. बल्कि उल्टे वन विभाग आज धड़ल्ले से देश की आजादी के पूर्व का 1922 के नक़्शे के आधार वनों का सीमांकन कर रही है। इससे कई ग्रामवासियों को अतिक्रमण के नाम पर झूठे मुकदमों में फंसाया जा रहा है।

गढ़वा जिले में तो अधिकारियों ने हद ही कर दी है. वहां दर्जनभर लोगों को सामुदायिक अधिकार को भी ब्याक्तिगत पट्टे की तरह वितरण किया गया. जिसपर गांवों को अधिकार के नाम पर झुनझुना थमाए गए हैं. दूसरी तरफ अनुमंडल और जिला स्तरीय समितियां वगैर किसी प्रक्रिया और दावे के बिजली ग्रिड और दूसरी कंपनियों को अपने उपक्रम स्थापित करने के लिए वनाधिकार पट्टा निर्गत किये हैं. उन्होंने ग्राम सभाओं से ऐसे भ्रष्ट अधिकारियों पर एट्रोसिटी एक्ट के तहत् प्राथमिकी दर्ज कराने की सलाह दी. 

इस कार्यक्रम में सभी 5 प्रमंडलों से 25 जनसंगठनों 45 प्रतिभागी शामिल हुए. जिसमें मुन्नी हांसदा, चरण कुमार, मेरी निशा, शनियारो, उमेश उषा, ऋषि, माणिकचंद कोरवा, तागरेन केरकेट्टा, ज्योति लकड़ा, जेन्नी टोप्पो, तुलिका कुजूर, सुरेन्द्र तिर्की, हनुक लकड़ा, अलफोंस लकड़ा, भादे उराँव, चैतु सिंह खरवार, तेओफिल लकड़ा, अर्पणा बाड़ा आदि प्रमुख तौर पर मौजूद थे. कार्यक्रम में आये प्रतिभागियों का स्वागत मिथिलेश कुमार एवं धन्यवाद ज्ञापन फिलिप कुजूर ने की.

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